कृष्ण जन्मउत्सव की धूम।।बोलों राधे राधे।। वर्तमान परिवेश में कृष्ण मूल्यों की प्रसागिगता।।

कृष्ण जन्माष्टमी कृष्ण जन्मउत्सव की धूम।।बोलों राधे राधे।। वर्तमान परिवेश में कृष्ण मूल्यों की प्रसागिगता।।

 बोलो राधे राधे..

सारे देश में कृष्ण जन्म उत्सव बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।द्वापरयुग में श्री कृष्ण ने रोहणी नक्षत्र में बुधवार के दिन जन्म लिया था। कृष्ण जन्म से जुड़ी रोचक कथा सभी जानते हैं।माता देवकी और वासुदेव की आठवीं सन्तान के रूप में श्री कृष्ण ने जन्म लिया था।एक आकाशवाणी के अनुसार कृष्ण जी का जन्म उनके मामा कंस की वध के लिए हुआ था।कंस के बढ़ते हुए अत्याचार से उन्होंने जनमानस को मुक्ति दिलायी थी।

प्रेम का प्रतीक।

यदि हम बोलते हैं प्रेम तो कृष्ण याद आते हैं।शिंगार से होते हुए प्रेम कैसे आत्मा तक पहुँच जाता है ये भाव राधा कृष्ण के प्रेम ही मिलता हैं। राधे राधे जपो चले आएंगे बिहारी इस गीत के बोल को सुनते ही मन मे असीम प्रेम और समर्पण का भाव जागृत हो जाता हैं।
कृष्ण ने प्रेम को उस उच्च शिखर पर पहुँचा दिया जहाँ तक पहुँचना तो मुश्किल लगता है किन्तु असंभव नही है।बस अपनी सोच को अहंकार से अलग करना होगा।

कृष्ण जन्माष्टमी


कृष्ण ने हर रिश्ते की तरह प्रेम को भी मान और स्थान दिया।राधा का नाम हमेशा के लिये कृष्ण के साथ जुड़ गया और पूजनीय हो गया।क्या ये प्रेम का अनोखा ,दिव्य,सुंदर रूप नही है।कि सिर्फ प्रेम में आप परमात्मा को पा लो।वास्तव में प्रेम में ही इतनी शक्ति है कि आप उस ईश्वर के नजदीक पहुँच जाते हैं और चरम सुख को प्राप्त करते हैं।

हमारा मानना है कि जब हम प्रेम में होते हैं तो कृष्ण के नजदीक होते हैं। उस वक़्त हम किसी वैरभाव में नही पड़ते।किसी के कहे अपशब्दों का हम पर कोई असर नही होता।हम सुंदर हो जाते हैं। सत्यम शिवम सुंदरम के दिव्य भाव मे चले जाते हैं।

मित्रता का अनूठा उदहारण।

भारतीय दर्शनशास्त्र हो ,अध्यात्म ,योग या व्यव्हारिक सामाजिक जीवन सभी मे कृष्ण समाये हुए हैं।इन तीनो का अद्धभूत सगंम हमें कृष्ण लीला से जुड़ी कथाओ में देखने को मिलता है। वास्तव में जीवन कैसा हो और कैसे जियें ये हमे कृष्ण की भागवत गीता सिखाती हैं। 

मित्रता की बात चले तो कृष्ण सुदामा की कथा याद आ जाती है।इस कथा में आध्यात्म और दर्शन शास्त्र को भी आप स्पष्ट रूप से देख सकते हैं।कहते हैं सुदामा इस लिये निर्धन हुए क्योकि गुरुकुल में उन्होंने गुरु माता के दिये हुए चावल जो कि कृष्ण और सुदामा दोनों के लिये थे उसे सुदामा ने सारे ही खा लिये थे। ये हुआ कर्म और अध्यात्मअब आता है कृष्ण का राजा होते हुए भी मित्र के लिये महल के द्वार तक दौड़े चले आना ये मित्रता का अनूठा उदहारण है।

वर्तमान परिवेश और कृष्ण ।

प्रेम ,मित्रता,व्यवहारिक समाज का जो अद्धबूत उदहारण हमे कृष्ण कथाओं ओर भागवत गीता में देखने को मिलता है यदि उन सभी बातों को हम अपने वर्तमान जीवन मे लाये तो निश्चित ही हमारा जीवन बहुत सरल हो जाएगा।

व्यस्तता से भरी आज की जीवनशैली ने हमें कहा ला कर खड़ा कर दिया है जहाँ हमारे पास खुद के लिये समय नही है।जरूरत से ज्यादा औपचरिकता ओर खोखला आकर्षण हमे अकेला करता जा रहा है।कृष्ण जब माखन चुराया करते थे तो क्या वो वास्तव में चोरी थी।पूरे नंद गाँव को को उन्होंने अपना बना लिया था। अपनी लीलाओं के बहाने सब के दुख सुख में मिल जुल कर सहयोग करना एक मज़बूत समाज को व्यक्त करती है।

क्या आज के जीवन मे हम किसी के इतने करीब हैं।नही महानगरों में तो एक पड़ोसी को दूसरे की शक्ल देखे हुए कई कई दिन हो जाते हैं।एकल परिवारों के बच्चे विचित्र मानसिकता के शिकार होते जा रहे हैं।2 /3 साल के बच्चे को खाना खिलाने के लिए मोबाईल का इस्तेमाल हो रहा है।घर मे बड़े बुजुर्गों के लिये न जगह है ना वक़्त ।किसी मेहमान को भी अब भगवान नही समझा जाता।

ऐसे में कृष्ण और भी प्रासंगिक हो जाते। जब द्रोपदी के चीर हरण के वक़्त कृष्ण का मौजूद हो कर उनके मान की रक्षा करना।सिर्फ इस लिये की एक बार जब कृष्ण को हाथ मे चोट लगी थी तो द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर उन्हें पट्टी बंधी थी।इसी लिये कृष्ण ने उनके चीर की रक्षा करी।इस भाव को आप क्या कहेंगे ?

आकर्षण का सिद्धांत और कृष्ण ।

कहाँ नही हैं कृष्ण अध्यात्म, ज्ञान,योग,व्यवहार सब जगह कृष्ण हैं। आकर्षण के  सिद्धान्त में भी कृष्ण हैं। वो कहते हैं आप मेरे बारे में जैसा सोचोगे मैं वैसा ही हो जाऊँगा।आकर्षण का सिद्धांत भी यही कहता है।आप जो सोचते हैं जो मानते हैं वैसा ही होगा।
हमे एक छोटी सी कथा याद आ गई आपको जरूर अच्छी लगेगी और आप कुछ सोचने पर मजबूर हो जायेगे।

एक बार श्री कृष्ण भोजन करने बैठे।रुक्मणि जी ने भोजन परोसा ।कृष्ण ने पहला निवाला तोड़ा और जैसे ही उसे मुँह में रखने लगे कि परेशान हो कर उन्होंने निवाला वापिस थाली में रख दिया।फिर उठ कर महल के द्वार की तरफ भागे।द्वार तक जा कर फिर निराश भाव से वापिस लौट आये और चुपचाप भोजन कारने लगे।रुक्मणि जी से नही रहा गया और उन्होंने पूछ ही लिया । ' हे प्रभु आप यू अचानक भोजन से उठ कर द्वार तक क्यो गए थे ? फिर निराश भाव से लौट क्यो आये ? ' कृष्ण बोले ' प्रिय मेरा एक भग्त है जो मुझे हमेशा याद करता है इस वक़्त वो एक ऐसे गांव से गुजर रहा है जहाँ के लोग बहुत दुष्ट हैं वो उसे पत्थर मार रहे हैं। और वो जोर जोर से मुझे पुकार रहा था हरि बचाओ ..हरि बचाओ.."  "फिर आपने उसे क्यो नही बचाया प्रभु" ?"
रुक्मणि जी ने पूछा। कृष्ण बोले -- बचाने ही गया था प्रिय लेकिन मैंने देखा कि उसने खुद पत्थर उठा लिया था ।"

हमें हमेशा ये कथा विश्वास के भाव एवं भक्त औऱ भगवान के अनोखे  रिश्ते की मजबूती और वर्तमान समय में इस कथा के मर्म को समझने की जरूरत की तरफ इशारा करती है।

तो कृष्ण हमेशा थे,हैं और रहेगें। इसी के साथ कृष्ण जन्माष्टमी की ढेर सारी शुभकामनाएं। कृष्ण हमेशा आप सब के साथ रहे और आपको रास्ता दिखाये। इसी कामना के साथ हम संकल्प लेते हैं आपकी सोच और व्यवहार को एक अलग सकारात्मक नजरिया देगें।

कृष्ण, कृष्ण जन्माष्टमी, कृष्ण और वर्तमान परिवेश,अध्यात्म

Post a Comment

1 Comments