ग़ज़ल Gazal शायरी वो शोखियाँ, वो इनायतें और शब्-ए-वस्ल....

ग़ज़ल शेरों-शयरी का उर्दू अदब में अपना एक मुकाम है। दिल नाजुक जज्बात पेश करने का एक खूबसूरत जरिया है शायरी..तो पेश-ए-ख़िदमत है सीमा रिफ़अत की कुछ चंद ग़ज़लें उम्मीद है आपको पसंद आयेगी।

गज़ल

वो शोखियाँ, वो इनायतें और शब्-ए-वस्ल...

वो माज़रत में है अपनी बदगुमाँनियो के लिये
मेरा शिकस्ता-ए- इश्क़ अभी बाक़ी है ।।

थक के अब, बस बैठ ही जाते
तेरा इंतजार-ए-इम्तहान अभी बाक़ी है ।।

वो शोखियाँ,वो इनायतें और शब्-ए-वस्ल
क्या कहें,क्या-क्या अभी बाक़ी है ।।

दीदार-ए-तमन्ना और हक़ूके-इश्तियाख
तुझपे इल्जाम अभी बाक़ी है ।।

वो उठ रहा है बज़्म-ए-महफ़िल से
कोई कहे, क़ि तलबगार अभी बाक़ी है ।।

हम हो चुके हैं कत्ल ज़बान-ए-खंजर से
धड़कनों में अभी नाम रिफ़अत बाक़ी है ।।
                                             सीमा रिफ़अत
माज़रत- माफ़ी
बदगुमाँनिया- गलतफहमी
शब्-ए-वस्ल- मिलन की रात
हक़ूके-ए-इश्तियाख- चाहने का हक़

  Gazal

Vo mazrat mai hai apni badgumaniyo ke liy
Mera shikasta- a- ishk abhi baki hai.

Thak ke ab,bas bath hi jate
Tera entjar- a- emtihan abhi baki hai.

Vo shokhiya,vo enayte aor shb- a -vasl
Kya kahe,kya kya abhi baki hai.

Didar-a-tamnna aor hakuke-eshtiyakh
Tujhpe eljam abhi baki hai.

Vo uth rha hai bajm-a-mahfil se
Koi kahe ki talbgar abhi baki hai.

Ham ho chuke hai katl jaban-a-khanzar se
Dharkano mai abhi naam rifat baki hai.
                                                          Seema rifat.

ग़ज़ल

सुना है तेरी चश्म-ए-रौशन का तिलिस्म-ए-हंगामा..

चल तेरा पाक-ए-गिरहबा देखें
इश्क में तुझको आज़मा कर देखें ।।

बड़ा चर्चा है तेरे दिल की गहराइयो का
एक कश्ती हम भी डूबा कर देखें ।।

सुना है तेरी चश्म-ए-रौशन का तिलिस्म-ए-हंगामा
रात चाँदी और दिन सोने का बना कर देखें ।।

सो चुके बहुत कब्र-ए-कफ़स में रिफ़अत
अब खुद को थोड़ी हवा दिखा कर देखें ।।
                                   सीमा रिफअत.

चश्म-ए-रौशन- आँखो की रौशनी
तिलिस्म-जादू
कब्र-ए-कफ़स- कब्र में कैद,जेल

Gazal

Chal tera pak-a-girhba dekhe
Ishk mai tujhko aazma kar dekhe.

Bada charcha hai tere dil ki gahraiyo ka
Ek kashti ham bhi duba kar dekhe.

Suna hai tere chashm-a-roshan ka tilism-a-hangama
Raat chandi aor din sone ka bana kar dekhe.

So chuke bahut kabr-a-kafs mai rifat
Ab khud ko hwa dikha kar dekhe.

ग़ज़ल

महबूब था मेरा,हमराज था कभी...

बिला वज़ह वो मुझको सलाम करता है
ख़ुदा जाने अब दिल कैसे तमाम करता है ।।

बेयकिनिया मेरी जब हद से गुज़र गयी
तब आकर वो वादे हज़ार करता है ।।

महबूब था मेरा,हमराज़ था कभी
अब रंजिशें वही बेहिसाब करता है ।।

वादे वफ़ा सब लफ़्ज़ों का खेल है
दिल-ए-नादाँ फिर क्यों एतबार करता है ।।

सो चुके अरमां जब कब्र में रिफ़अत
तब आकर वो इज़हारे वफ़ा करता है ।।
                                         सीमा रिफ़अत.

Gazal.

Bila vazah vo mujhko slam karta hai
Khuda jane ab dil kaise tamam karta hai.

Beyakiniya meri jab had guzar gai
Tab aakar vo vade hazar karta hai.

Mahboob tha mera,hamraj tha kabhi
Ab ranjishe vahi behisab karta hai.

Vade wafa sab lafzo ka khel hai
Dil-a-nada fir kyo atbaar karta hai.

So chuke arma jab kabr mai rifat
Tab aakar vo ezhare wafa karta hai.

एक लफ्ज़ हूँ, महज़ बेकार आवारा सा...

तुम जो चाहो,तो क्या नहीं कर दो
उजड़े सहरा को गुलिस्ता कर दो ।।

एक लफ्ज़ हूँ, महज़ बेकार आवारा सा
तुम जो चाहो तो पूरी किताब कर दो ।।

खामियां मुझ में है, तो बताया करो
ये क्या क़ि गैरो से ताल्लुक कर दो ।।

खरामा-ख़राम दो चार दिन की जिंदगी
बेसबब यूँ ना रूठ जाया करो ।।

मैं तेरे हुस्न का दीवाना सही
यूँ मेरे इश्क को ना आज़माया करो।।
                                     सीमा रिफ़अत

ग़ज़ल

मैं अपने आप से पूछता हूँ खुद का पता....

कभी तेरे शहर,यूँ भी आएंगे सोचा ना था
नम आँखों से मुस्करायेगे सोचा ना था।।

दीदार-ए-हसरत में तमाम उम्र गुज़ार कर
यूँ तेरे पास से गुज़र जायेंगे सोचा ना था ।।

मैं अपने आप से पूछता हूँ, खुद का पता
यूँ खुद को भूल भी जायेंगे सोचा ना था।।

बराए नाम मैं उसके जिक्र में शामिल हूँ
मेरे वजूद मै वो घुल जायेगा सोचा ना था।।

छुपाऊँ लाख पैबंद रूह-ए-मरियम के
वो आईना बन के आ जायेगा सोचा ना था।।
                                         सीमा रिफ़अत

ग़ज़ल

ज़रा-ज़रा तेरे इश्क में हमदम
बन के कतरा मैं पिघल जाऊ।।

मेरे वजूद-ए-खामियों की जुस्तजू इतनी
तुझ मैं घुल कर मुकम्मल सवर जाऊ।।

वो पूछते रहे दिल धड़कने का सबब
बंद चिलमन में खुदरा कही ना जल जाऊ।।

बाखबर मुझसे वो रहता है आजकल
बेखबर खुद से मै यारब ना हो जाऊ।।

ज़माने भर की दौलते हों उसकी तुरबत मे
हो यहीं शौके जुनूं और मैं गुज़र जाऊ।।
                                       सीमा रिफ़अत.
आग़ोश में किसी की सोया वो चैन से...सीमा रिफ़अत
Tage - gazal, shayri

Post a Comment

0 Comments